भारत एक ऐसा नायब देश है जहाँ की आधी जनता सरकारी है.
यह बहुत ही महत्ववपूर्ण स्टटिस्टिक है जिसको सही मायने में समझने के लिए हमें दिल्ली जाना पदेहगा.
कई गलियो से बना यह शहर मेक्का है, मदीना है, हरिद्वार है, वैटिकन है उन लोगों का जो सरकार बनना चाहते हैं, वैसे नहीं जैसे अमिताभ बच्चन अपनी एक मूवी में था,पर वैसे जैसे लाल बत्ती के धारक सड़को पर दिखाई देते हैं।
या तोह लोग सरकार के किसी डिपार्टमेंट में लगे हुए हैं, या फिर किसि परीक्षा के द्वारा लगने की उम्मीद में हैं. कुछ फितूर ही है देशवासियो जो उन्हें हज़ारो घंटे मेहनत करने पर मजबूर करता है उन चंद नौकरियों के लिए, जो आज भी मानो अंग्रेजी शान औ शौकत को पाने की कोशिश लगती है।
इंसान अपनी ज़िन्दगी में ख़्वाहिशें तोह रखता ही है. तोह मैंने भी सोचा की क्यों ना बाबू बच्चा बना जाए. ऐसा मुझे माँ बचपन में बुलाती थी, और कुछ कशिश भी लगी अपने नाम के आगे आईएफएस जोड़ने में।
सही मायने में देखा जाए, तो लोग बाबू सिर्फ इस लिए बनना चाहते हैं क्यूंकि इस काम में उन्हें इज़्ज़त बहुत मिलती है. बाकी कारण भी हैं, देश सेवा और लोगो की मद्दद कर पाना, पर वह काम तो आर्मी में जा कर या नर्स बन कर ज़्यादा अच्छे से किये जा सकते थे, लेकिन वहां इतनी मारा मरी नहीं है लोगो की।
जो भी हो, देर सवेर मैंने जम्मू से दिल्ली की ट्रैन पकड़ी और एक सस्ते होटल में जा कर अपना सामान रख दिया। रेलवे स्टेशन के पास ही गुरूद्वारे पर दाल रोटी खा कर मैं अब पहला इन्तेहाँ देने चला गया....... वाजीराम में जा कर अपनी सीट खरीदने का।
यह बहुत ही महत्ववपूर्ण स्टटिस्टिक है जिसको सही मायने में समझने के लिए हमें दिल्ली जाना पदेहगा.
कई गलियो से बना यह शहर मेक्का है, मदीना है, हरिद्वार है, वैटिकन है उन लोगों का जो सरकार बनना चाहते हैं, वैसे नहीं जैसे अमिताभ बच्चन अपनी एक मूवी में था,पर वैसे जैसे लाल बत्ती के धारक सड़को पर दिखाई देते हैं।
या तोह लोग सरकार के किसी डिपार्टमेंट में लगे हुए हैं, या फिर किसि परीक्षा के द्वारा लगने की उम्मीद में हैं. कुछ फितूर ही है देशवासियो जो उन्हें हज़ारो घंटे मेहनत करने पर मजबूर करता है उन चंद नौकरियों के लिए, जो आज भी मानो अंग्रेजी शान औ शौकत को पाने की कोशिश लगती है।
इंसान अपनी ज़िन्दगी में ख़्वाहिशें तोह रखता ही है. तोह मैंने भी सोचा की क्यों ना बाबू बच्चा बना जाए. ऐसा मुझे माँ बचपन में बुलाती थी, और कुछ कशिश भी लगी अपने नाम के आगे आईएफएस जोड़ने में।
सही मायने में देखा जाए, तो लोग बाबू सिर्फ इस लिए बनना चाहते हैं क्यूंकि इस काम में उन्हें इज़्ज़त बहुत मिलती है. बाकी कारण भी हैं, देश सेवा और लोगो की मद्दद कर पाना, पर वह काम तो आर्मी में जा कर या नर्स बन कर ज़्यादा अच्छे से किये जा सकते थे, लेकिन वहां इतनी मारा मरी नहीं है लोगो की।
जो भी हो, देर सवेर मैंने जम्मू से दिल्ली की ट्रैन पकड़ी और एक सस्ते होटल में जा कर अपना सामान रख दिया। रेलवे स्टेशन के पास ही गुरूद्वारे पर दाल रोटी खा कर मैं अब पहला इन्तेहाँ देने चला गया....... वाजीराम में जा कर अपनी सीट खरीदने का।
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