Monday, 5 September 2016

आसां सिर्फ अंदर आना था




आसां सिर्फ अंदर आना था 


अगर आप कभी राजेंद्र नगर की गलियो का दौरआ मारो ,तो एक चीज़  की वह सिर्फ स्टूडेंट्स ही दीखते हैं, हर नुकके  पर,दूकान  में,किताबो की दुकानों में, घरो में, और कुछ ठेको में. 

इतने सरे लोग वह जमा सिर्फ उस एक एग्जाम के लिए होते हैं जिसमे सिर्फ १००० लोग हर साल जायेंगे. जब  मैंने वाजी राम में एंट्री मरी तो  लगा की १०,००० बच्चा वह बैठा है, रिजिस्टर करवाने के लिए अपने आप को. मुझे पहली सोच आई की अब भाई अगर  सिर्फ यहाँ ये हालात है, तो बेहेन*&@ पुरे इंडिया में क्या हालात होगी? 

मतलब, दिल बैठ जाता है मासूमो का चेहरा देख कर. मुझे तो भाई दाड़ी आयी है तो में कही से मासूम बच्चा नहीं लगता। सबसे  फटाफट व्हआ एडमिशन ही होती है, उसके बाद  से तो तौबा है। 

बहार आओ, तो बिचोलियो का समूह बैठा होता है, आपका शिकार करने। मैंने सोच लिया था की किसि को फ़ालतू कमीशन नही दूंगा, और अपना घर किसी मोबाइल अप्प से ढूंढ लूँगा.  आखिर दिल्ली इतनी छोटी थोड़ी है की घरो की कमी हो ? ( आखिर इंसान से ही गलती होती है न ?) 

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