Monday, 5 September 2016

अब क्योंकि

अब क्योंकि

तीन दिन हो गए थे, मैंने शायद इतना विश्व ब्रहमन एक ही शहर में पहले कभी नहीं किया था. कभी कोई घर के नाम पर होटल दिखाये, तोह कभी कोई खोली ..... अप्प्स पर भी बिचोलिये ही अपनी नज़र टिकाये बैठे थे. हालात यह थी की मुझे समझ नहीं आ रहा था की मैं यहाँ रह भी पाउँगा की नहीं.

"यह गुप्ता जी हैं, आप इनके साथ जाएं। यह आपको सारे घर एक के बाद एक दिखा देंगे " मेज़ पर बैठे डेवलपर ने कहा. वोह डेवलपर कम और किसि जेवेलरी कंपनी का मॉडल ज़्यादा लग रहा था.

गुप्ता जी एक लंगड़आकर  चलने वाले और खूंखार दिखने वाले गाइड थे. ८० करोड़ घर दिखाए होंगे, सब के सब वाहियाद और  महँगे  जैसे कोई  महल हो. मुझे आदत नहीं थी यह सोचने की, की एक  कमरआ (छोटू सा ) और बिना ऐरकंडिशनेर के, दस हज़ार का मिलेगा। मेरी उममीदें ज़्यादा थी, और उनकी भी. अंत में हम थक कर दोनों अपने अपने घर चले गए.

फिर मैंने एक आखरी बार कोशिश करने  की ठानी, हलाकि मुझे नही पता की उसके बाद में क्या करता !

एक घर था, शादी नगर नाम की जगह पर. वो भी एक झुग्गी थी, पर लोगो ने अब ईंटे और पत्थर लगा कर उसको पअक्का कर दिया था. पानी की पाइपो का एक जाल पैरो में बिछा था,  गालिया इतनी संकरी की टेढ़ा होकर चलना पढ़े और इतने लोग की अगर कल को दुनिया ख़तम हो जाए, तो दो ही सालो में उसको आबाद कर दे सिर्फ यह नगर. मैं यहाँ सिर्फ एक ऑफर के चक्कर में आया था, की कोई सेक्युरटी नहीं, कोई एडवांस नहीं... सीधा घर मिलेगा। यार  कोई क्यों ऐसा देगा ?

मैं घर में दाखिल हुआ तो वो भी ठीक लग रहा था. दो कमरे, किचन और लॉबी। लेकिन माकन मालिक का पता नहीं लग रहा था.

"हांजी आपने कॉल की थी क्या? "

मैंने सामने से बिना बाल का भालू देखा। हस्तआ हुआ पास आया और अपनी गाथा सुनाने लगा. उसको कस्टमर फ़साना अच्छे से आता था. लेकिन इस बात का पता मुझे तब कैसे चलता ?

 वह रुका नहीं, बस बोलता रहा, मनाता रहा, जब तक मैंने उसके पैसे उसके हाथ में थम नहिन् दिए.

उसने चाबी मेरे हाथ में दी और वो निकल गया, मुझे थोड़ा सोच में छोड़ कर. 

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